संस्थागारिक सैथवार-मल्ल क्षत्रिय समाज हमेशा से ही सनातन मूल्यों के प्रति गम्भीर रहा है। महात्मा बुद्ध भी संस्थागारिक क्षत्रिय समाज से ही थे।
सत्य-अहिंसा का उपदेश भारतवर्ष के साथ-साथ एशिया महाद्वीप के कई देशों में अपने विचार का प्रचार-प्रसार किया, लेकिन कभी भी अपने आप को क्षत्रिय वर्ण/वर्ग से अलग नही माना।
80 वर्ष की अवस्था में अपना अंतिम उपदेश कुशीनारा में दिया और यही पर परिनिर्वाण को प्राप्त हो गये।
चूँकि महात्मा बुद्ध अपनो मे से ही थे, और वो क्षत्रिय समाज से थे।
महापरिनिर्वाण के पश्चात उनके अस्थि अवशेषों में बंटवारा भी 8 क्षत्रिय वंशो, में किया गया था। जो निम्नलिखित है।
(1) कुशीनारा के मल्ल(आधुनिक कुशीनगर)
(2) पावा के मल्ल(आधुनिक फाजिलनगर का क्षेत्र जो कालांतर में मझौली/ मधुबन में अपने उपनिवेश स्थापित किये )
(3) रामग्राम के कोलिय (आधुनिक गोरखपुर)
(4)कपिलवस्तु के शाक्य( शाल(साखू) वृक्ष से आच्छादित प्रदेश में निवासरत क्षत्रिय
(5) मगध(आधुनिक राजगृह) के राजा अजातशत्रु
(6) वैशाली(आधुनिक हाजीपुर) के लिच्छवी
(7) अल्पकप के बुलि
(8) वेतद्वीप के ब्राह्मण
पिपलिवन के मौर्य●मोर पक्षी की बहुलता से आच्छादित● प्रदेश(आधुनिक सम्भवतः झगहा के पास स्थित राजधानी गाँव का क्षेत्र) सबसे अंतिम में पहुँचे थे, अतः उन्हें अस्थि अवशेष दिया गया था।
ब्राह्मण द्रोण, जिसने अस्थि अवशेष को बांटा था, वो अस्थि कुम्भ लिया।
इस प्रकार बुद्ध के अवशेषों पर 8 स्तूप बना।
9वां कुम्भ स्तूप
और 10वां अंगार स्तूप बना।
कुशीनारा के मल्लों ने दाह-संस्कार के स्थान पर स्तूप बनाया जिसे रामाभार स्तूप या मुकुट-बंधन चैत्य के नाम से जाना जाता है
राष्ट्रीय सैंथवार-मल्ल स्वाभिमान मोर्चा

